भोपाल में वेस्टर्न बायपास विवाद, IAS अधिकारियों की जमीन खरीद पर सवाल
भोपाल: मध्य प्रदेश की राजधानी में वेस्टर्न बायपास के प्रोजेक्ट और नौकरशाहों द्वारा खरीदी गई जमीन को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। साल 2013 से 2016 बैच के कई आईएएस (IAS) अधिकारियों ने भोपाल की हुजूर तहसील के गुराड़ी घाट में आवासीय मंशा से जमीन खरीदी थी। अब आरोप लग रहे हैं कि वेस्टर्न बायपास के मार्ग (एलाइनमेंट) में बदलाव इन अधिकारियों को आर्थिक लाभ पहुँचाने के लिए किया गया है।
बायपास के मार्ग में बदलाव पर उठे सवाल
विवाद की मुख्य वजह भोपाल वेस्टर्न बायपास का बदला हुआ रूट है। पहले यह बायपास रातापानी टाइगर रिजर्व और बड़े तालाब के कैचमेंट एरिया से गुजर रहा था, लेकिन पर्यावरणीय आपत्तियों के कारण इसके एलाइनमेंट में परिवर्तन किया गया। नया मार्ग अब आईएएस अधिकारियों द्वारा खरीदी गई जमीन के बेहद करीब से गुजर रहा है। आलोचकों का कहना है कि कृषि भूमि का उपयोग बदलकर उसे रहवासी करना और बायपास का पास से निकलना, जमीन की कीमतों में भारी उछाल लाएगा।
प्रमुख आईएएस अधिकारियों के नाम आए सामने
जमीन खरीदने वाले अधिकारियों में प्रदेश के कई जिलों के कलेक्टर और वरिष्ठ आईएएस शामिल हैं।
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रजनी सिंह (नरसिंहपुर कलेक्टर): इन्होंने 22 लाख रुपये की जमीन का उल्लेख अपने अचल संपत्ति विवरण में किया है।
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साकेत मालवीय (अशोक नगर कलेक्टर): इन्होंने 24 लाख रुपये में जमीन का हिस्सा खरीदा।
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अंशुल गुप्ता (विदिशा कलेक्टर): इन्होंने 13 लाख रुपये की कृषि भूमि समूह में खरीदी।
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मयंक अग्रवाल (आईएएस): इन्होंने भी 12.50 लाख रुपये में भूखंड खरीदा। इन सभी अधिकारियों ने साल 2022 में ये संपत्तियाँ खरीदी थीं।
प्रशासनिक मजबूरी या सोची-समझी रणनीति?
सरकार का तर्क है कि एलाइनमेंट में बदलाव मजबूरी थी। रातापानी को टाइगर रिजर्व घोषित किए जाने के बाद पुराना मार्ग बफर जोन में आ गया था, जिससे प्रोजेक्ट के निरस्त होने का खतरा था। नया मार्ग 31.61 किलोमीटर लंबा होगा, जिससे शहर का यातायात दबाव कम होगा। हालांकि, बायपास के इस नए गणित ने जमीन सौदों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
अधिकारियों की सफाई: नियमानुसार हुआ सौदा
विवादों के बीच संबंधित अधिकारियों ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि जमीन पूरी तरह पारदर्शी तरीके से और शासन की अनुमति लेकर खरीदी गई है। नरसिंहपुर कलेक्टर रजनी सिंह के अनुसार, जब जमीन ली गई थी तब बायपास का कोई अता-पता नहीं था। अधिकारियों का कहना है कि कृषि भूमि को आवासीय में बदलना एक सामान्य प्रक्रिया है और इसके लिए निर्धारित शुल्क चुकाया गया है। उनके अनुसार, यह विवाद बेवजह और तथ्यों से परे है।
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