महिलाओं की सेहत पर बड़ा खुलासा, ओवेरियन कैंसर के लक्षणों को पहचानना क्यों है जरूरी
मानव शरीर प्राकृतिक रूप से एक बेहद शक्तिशाली सुरक्षा तंत्र की तरह काम करता है। यह अपने भीतर इतना सक्षम है कि कई गंभीर बीमारियों से मुकाबला करके उन्हें स्वतः ही समाप्त कर देता है और हमें इसकी भनक तक नहीं लगती। इसके साथ ही, आंतरिक गड़बड़ी होने पर शरीर हमें लगातार संकट के संकेत (वार्निंग साइन) भी भेजता है, लेकिन हम अक्सर उन्हें दैनिक तनाव या सामान्य थकावट समझकर नजरअंदाज करने की भूल कर बैठते हैं।
लगातार शरीर में कमजोरी महसूस होना, भूख का कम होना, किसी भी कार्य में एकाग्रता न बन पाना और बार-बार ध्यान भटकने जैसी समस्याओं को अमूमन लोग मानसिक तनाव या डिप्रेशन (अवसाद) का नाम दे देते हैं। लेकिन हालिया वैज्ञानिक शोधों ने डॉक्टरों को एक नए खतरे के प्रति आगाह किया है कि कहीं ये सामान्य दिखने वाले लक्षण महिलाओं में होने वाले साइलेंट किलर यानी ओवेरियन कैंसर (अंडाशय के कैंसर) के शुरुआती संकेत तो नहीं?
बीमारी के निदान में भ्रम: डिप्रेशन समझकर होता रहता है गलत इलाज
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामने आई एक विस्तृत वैज्ञानिक रिपोर्ट ने चिकित्सा जगत के विशेषज्ञों को नए सिरे से सोचने पर विवश कर दिया है। लंदन व अन्य वैश्विक केंद्रों के गायनोकोलॉजी विशेषज्ञों के अनुसार, ओवेरियन कैंसर की चपेट में आने वाली कई महिलाओं में शुरुआत में ऐसे शारीरिक बदलाव और लक्षण दिखाई देते हैं जो हूबहू क्लिनिकल डिप्रेशन जैसे प्रतीत होते हैं। यह समानता न केवल मरीजों को बल्कि अनुभवी डॉक्टरों को भी गंभीर असमंजस में डाल देती है। परिणाम यह होता है कि वास्तविक और घातक बीमारी शरीर के भीतर पनपती रहती है, जबकि बाहर मरीज का इलाज उस अवसाद के लिए किया जा रहा होता है जो उसे असल में है ही नहीं। सही समय पर कैंसर की पहचान न हो पाने के कारण इसकी घातक कोशिकाएं (मैलिग्नेंट सेल्स) धीरे-धीरे पेट के अन्य संवेदनशील अंगों को प्रभावित करने लगती हैं।
ओवेरियन कैंसर: वैश्विक आंकड़े और छिपे हुए खतरे
चिकित्सा शोधों के आधार पर ओवेरियन कैंसर से जुड़े कुछ बेहद महत्वपूर्ण तथ्य निम्नलिखित हैं:
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वैश्विक स्थिति: यह घातक बीमारी पूरी दुनिया में महिलाओं में पाया जाने वाला आठवां सबसे आम और खतरनाक कैंसर है, जिसकी वजह से प्रतिवर्ष वैश्विक स्तर पर दो लाख से अधिक महिलाएं अपनी जान गंवाती हैं।
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देरी से पहचान: समय पर नियमित स्क्रीनिंग और जांच की व्यवस्था न होने के कारण, लगभग 70 से 80 प्रतिशत मामलों का पता तब चलता है जब कैंसर अपने 'एडवांस स्टेज' (तीसरे या चौथे चरण) में पहुंच चुका होता है।
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उत्तरजीविता दर (Survival Rate): अंतिम चरणों में बीमारी का पता चलने पर मरीजों में पांच साल तक जीवित रहने की संभावना 50 प्रतिशत से भी कम रह जाती है। इसके विपरीत, यदि इसके लक्षणों को शुरुआती दौर (स्टेज-1) में ही पहचान लिया जाए, तो लगभग 95 फीसदी महिलाओं को सुरक्षित बचाया जा सकता है।
क्यों गच्चा खा जाते हैं विशेषज्ञ?
कैंसर जर्नल में प्रकाशित इस नवीनतम क्लिनिकल ट्रायल के दौरान शोधकर्ताओं ने ओवेरियन कैंसर से पीड़ित 428 महिलाओं के स्वास्थ्य इतिहास और उनके लक्षणों का बारीकी से विश्लेषण किया। इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यह समझना था कि क्या कैंसर के कारण उत्पन्न होने वाली शारीरिक टूट-फूट महिलाओं को मानसिक रूप से डिप्रेशन का शिकार दिखा रही थी?
जांच में पाया गया कि जब महिलाओं में कैंसर की पुष्टि हुई, तब उनमें से अधिकांश ने ऊर्जा की भारी कमी, अत्यधिक आलस्य और भूख न लगने जैसी शिकायतें की थीं। ये सभी लक्षण मानक तौर पर डिप्रेशन के ही माने जाते हैं, जबकि मनोवैज्ञानिक परीक्षणों में उन महिलाओं में वास्तविक अवसाद का स्तर न के बराबर था।
अध्ययन की मुख्य सूत्रधार रेचल टेल्स के मुताबिक, कैंसर का उपचार (कीमोथेरेपी या सर्जरी) शुरू होने के एक साल बाद ये सभी लक्षण अपने आप गायब हो गए। इससे यह साफ संकेत मिलता है कि अंडाशय में ट्यूमर के कारण शरीर पर जो प्रभाव पड़ता है, वह कृत्रिम रूप से डिप्रेशन जैसी स्थिति पैदा कर देता है।
चिकित्सकों के लिए नई गाइडलाइंस की सिफारिश
सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस भ्रम के कारण ओवेरियन कैंसर के शुरुआती संकेतों को अक्सर इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम (IBS), मेनोपॉज (रजोनिवृत्ति), बढ़ती उम्र या केवल मानसिक तनाव मानकर टाल दिया जाता है।
अतः वैज्ञानिकों ने चिकित्सा बिरादरी के लिए यह अनिवार्य सिफारिश की है कि किसी भी महिला मरीज में डिप्रेशन की दवाएं या काउंसिलिंग शुरू करने से पहले, उनके ओवेरियन और पेल्विक हिस्से की शारीरिक जांच (जैसे अल्ट्रासाउंड या CA-125 ब्लड टेस्ट) पर भी गंभीरता से विचार किया जाए। इससे न केवल गलत इलाज की संभावना खत्म होगी, बल्कि समय रहते इस साइलेंट किलर को पकड़कर अनमोल जिंदगियां बचाई जा सकेंगी।
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